भक्ति-पद तक ऊपर उठने के लिए हमें पांच बातों का ध्यान रखना चाहिए : 1. भक्तों की संगति करना, 2. भगवान कृष्ण की सेवा में लगना, 3. श्रीमद् भागवत का पाठ करना, 4. भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करना तथा 5. वृन्दावन या मथुरा में निवास करना | यदि कोई इन पांच बातों में से किसी एक में थोडा भी अग्रसर होता है तो उस बुद्धिमान व्यक्ति का कृष्ण के प्रति सुप्त प्रेम क्रमशः जागृत हो जाता है (CC.मध्य लीला 24.193-194) |

कृष्णभावनामृत हमारी चेतना को निर्मल तथ शुद्ध बनाने की विधि है |  जब मनुष्य हर वस्तु को अपनी मानता है तब वह भौतिक चेतना में रहता है और जब वह समझ जाता है कि हर वस्तु श्री कृष्ण की है तो वह कृष्णभावनामृत को प्राप्त कर लेता है | कृष्णभावनामृत में की गयी प्रगति कभी नष्ट नहीं होती | जिसने कृष्ण के प्रति प्रेम उत्पन्न कर लिया वही भक्त है | गीता (6.41-43) में भगवान कृष्ण कहते हैं: “यदि भक्ति पूरी नहीं भी होती तो भी कोई नुकसान नहीं हे क्योकि असफल योगी पवित्र आत्माओ के लोक में अनेक वर्षो तक भोग करने के बाद या तो सदाचारी पुरुषों के परिवार में या धनवानो के कुल में जन्म लेता हें | ऐसा जन्म पा कर वह अपने पूर्व जन्म की देवी चेतना को पुनः प्राप्त करता हे और आगे उन्नति करने का प्रयास करता है” |

कृष्णभावनामृत में प्रगति करते समय हमें एक बात का और विशेष ध्यान रखना है: भगवान, भगवान के नाम तथा भगवान के भक्त के प्रति कभी भी अपराध नहीं करना है | इससे बचने का सरल उपाय है अपने आप को दीन तथा भगवान का दास समझना | भगवान ही केवल कर्ता है, हम तो अयोग्य व अधम है | सब में भगवान की उपस्थिति महसूस करते हुए सबको सम्मान दें | तथा साथ ही जो व्यक्ति दूसरों के गुणों तथा आचरण की प्रशंसा करता है या आलोचना करता है, वह मायामय द्वैतों में फसने के कारण कृष्णभावनामृत से विपथ हो जाता है (SB.11.28.2) |

भक्तिहीन व्यक्ति के लिए उच्च कुल, शास्त्र-ज्ञान, व्रत, तपस्या तथा वैदिक मंत्रोच्चार वैसे ही हैं, जैसे मृत शरीर को गहने पहनाना (CC.मध्य लीला 19.75) | प्रामाणिक शास्त्रों का निर्णय है कि मनुष्य को कर्म, ज्ञान तथा योग का परित्याग करके भक्ति को ग्रहण करना चाहिए, जिससे कृष्ण पूर्णतय तुष्ट हो सकें  (CC.मध्य लीला 20.136) | भक्ति के फलस्वरूप मनुष्य का सुप्त कृष्ण प्रेम जागृत हो जाता है | सुप्त कृष्ण-प्रेम को जागृत किये बिना कृष्ण को प्राप्त करने का अन्य कोई साधन नहीं है (CC.अन्त्य लीला 4.58) | गीता (BG.18.58) में भगवान कृष्ण कहते हैं: यदि तुम मेरी चेतना में स्थित रहोगे तो मेरी कृपा से बद्ध-जीवन के समस्त अवरोधों को पार कर जाओगे | लेकिन यदि मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नही करोगे, तो तुम विनिष्ट हो जाओगे | तथा  “जब भक्ति से जीव पूर्ण कृष्णभावनामृत में होता है तो वह वैकुण्ठ में प्रवेश का अधिकारी हो जाता है” (BG.18.55) |

शुकदेव गोस्वामी कहते हैं: “हे राजन!, जो व्यक्ति भगवन्नाम तथा भगवान के कार्यो का निरन्तर श्रवण तथा कीर्तन करता है, वह बहुत ही आसानी से शुद्ध भक्ति पद को प्राप्त कर सकता है | केवल व्रत रखने तथा वैदिक कर्मकांड करने से ऐसी शुद्धि प्राप्त नहीं की जा सकती” (SB.6.3.32) | भक्ति के बिना कोरा ज्ञान मुक्ति दिलाने में समर्थ नहीं है, लेकिन यदि कोई भगवान कृष्ण की प्रेममयी सेवा में आसक्त है तो वह ज्ञान के बिना भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है (CC.मध्य लीला 22.21) | मुक्ति तो भक्त के समक्ष उसकी सेवा करने के लिए हाथ जोड़े खड़ी रहती है |

नियमित भक्ति करते रहने से हृदय कोमल हो जाता है, धीरे धीरे सारी भौतिक इच्छाओं से विरक्ति हो जाती है, तब वह कृष्ण के प्रीति अनुरुक्त हो जाता है | जब यह अनुरुक्ति प्रगाढ़ हो जाती है तब यही भगवत्प्रेम कहलाती है (CC.मध्य लीला 19.177) | यदि कोई भगवत्प्रेम उत्पन्न कर लेता है और कृष्ण के चरण-कमलों में अनुरुक्त हो जाता है, तो धीरे-धीरे अन्य सारी वस्तुओं से उसकी आसक्ति लुप्त हो जाती है  (CC.आदि लीला 7.143) |भगवत्प्रेम का लक्ष्य न तो भौतिक दृष्टि से धनी बनना है, न ही भवबंधन से मुक्त होना है | वास्तविक लक्ष्य तो भगवान की भक्तिमय सेवा में स्थित होकर दिव्य आनन्द भोगना है | जब मनुष्य भगवान कृष्ण की संगति का आस्वादन कर सकने योग्य हो जाता है, तब यह भौतिक संसार, जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है  (CC.मध्य लीला 20.141-142)|